30 अगस्त 2011

हँस दीक्षा वाले भगवान जैसे पद को प्राप्त कर सकते हैं - मीनू

राजीव जी ! हैलो ! आपने अपने किसी ताजा लेख में लिखा है कि - जैसे 1 अति गरीब आदमी और अति सम्पन्न आदमी के बीच करोडों किस्म के स्तर के आदमी होते हैं । उसी तरह भक्ति में भी इस तरह करोंडो स्तर हो जाते हैं । जो जितना कमायेगा । उतना ही सुख पायेगा ।
राजीव जी ! मैं अब ये पूछना चाहती हूँ कि - क्या अगर इस बात को गहराई और विस्तार से समझें । तो क्या इस तरह गति भी करोंडो किस्म की हो जाती हैं ? जो जितनी भी और जैसी भी भक्ति कमायेगा । वो उतने ही अच्छे लोक में अधिक समय के लिये जायेगा । जो थोडा कम कमायेगा । वो थोडा कम अच्छे लोक में जायेगा । और कम समय के लिये जायेगा ।
ये बतायें कि - अब जैसे प्रसून जी नीलेश से अधिक निपुण हैं । तो क्या प्रसून जी की नीलेश से बेहतर गति होगी । उन दोनों के गुरु जी की पहुँच तो उन दोनों से अधिक है । तो क्या गुरु जी की गति उनसे भी बेहतर होगी ।
ये बतायें कि क्या वाकई प्रसून जैसे लोग आजकल के गुप्त माडर्न ऋषि मुनि हैं ? आप ऋषि और मुनि के शाब्दिक अर्थ भी समझा दें । ये भी बतायें कि प्रसून जी और उनके गुरु जी आदि को किस उपाधि से पुकारा जाता है । महात्मा । योगी । ऋषि । मुनि । महर्षि । साधु । तान्त्रिक । सिद्ध । मान्त्रिक । यन्त्र माहिर आदि में से क्या उपाधि है ?

इन जैसे लोग अक्सर किस तरह के लोकों में जाते हैं ? और कितनी देर के लिये जाते हैं ? फ़िर समय पूरा होने पर इन्हें अच्छी जगह मानव जन्म मिल जाता है । या ये लोग अपनी इच्छा अनुसार भी किसी अच्छे संस्कारों वाले घर में जन्म ले सकते हैं । प्रसून और नीलेश जैसे लोग 84 लाख योनियों में तो नहीं जाते । क्या प्रसून जी और उनके गुरु जी की पहुँच दसवें द्वार तक होती है ?
साथ साथ ये भी बता दें कि जिनकी भी पहुँच दसवें द्वार तक हो जाती है । क्या वो लोग 84 लाख योनियों में तो नहीं भटकते । उन्हें बार बार मानव जन्म मिल जाता है । क्या प्रसून और नीलेश जैसे लोग अपने गुरु जी के ही लोक में जाते हैं । या फ़िर वे अपनी अपनी योग्यता और गति अनुसार अलग अलग लोकों में जाते हैं । अगर ये अपनी स्व-इच्छा से इस धरती पर ही कहीं रहना चाहें । तो क्या अदृश्य रुप से भी कहीं भी रह सकते हैं । बेशक किसी जंगल या किसी अच्छे घर में ( वो बात अलग है कि घर के सदस्यों को इस बारे में पता न लगे )

ये भी बतायें कि हँस दीक्षा वाले अपनी भक्ति अनुसार ( बेशक अनेक जन्म लग जाये भक्ति में ही ) भगवान जैसे पद को भी प्राप्त हो जाते हैं । आपने अपने किसी ताजा लेख में ये भी कहा है कि - परमात्मा और ईश्वर में फ़र्क होता है ? तो फ़िर समझा दीजिये । क्या फ़र्क होता है ।
ये भी बतायें कि भगवान और ईश्वर में क्या फ़र्क होता है ? क्या अखिल सृष्टि में भगवान और ईश्वर से भी बडी गुप्त । अलौकिक । रहस्यमयी । सूक्ष्म शक्तियाँ होती हैं । जैसे महाकाल स्थिति में । अन्त में ये भी बता दें कि पण्डित । पुजारी । विद्वान । पण्डा । पण्डी । ब्राह्मण । बृह्म इन जैसे शब्दों के शाब्दिक अर्थ क्या हैं ? कृपया मुझे मेरे इन सभी सवालों के खुलकर जवाब देकर आप मेरी अच्छी तरह तसल्ली करवा दीजिये । कोई कसर मत छोडना । प्लीज ।
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बहुत दिनों से एक ही बात बारबार सोच रहा हूँ कि - वे आजकल कहाँ हैं ? जो आप सभी को यहाँ लाये थे । आप सभी के कितने मेल कितने ही फ़ोटो ब्लाग पर छप गये । पर उनका दूसरा फ़ोटो भी फ़िर से नहीं छपा । क्या उनके सभी प्रश्न खत्म हो गये ? उनके क्या हाल हैं ? वे आजकल कहाँ हैं ?
खैर..चलिये बातचीत आरम्भ करते हैं ।

तो क्या इस तरह गति भी करोंडो किस्म की हो जाती हैं ? जो जितनी भी और जैसी भी भक्ति कमायेगा । वो उतने ही अच्छे लोक में अधिक समय के लिये जायेगा । जो थोडा कम कमायेगा । वो थोडा कम अच्छे लोक में जायेगा । और कम समय के लिये जायेगा ।

- ये भी एक पढाई और उसके बाद उससे हुयी प्राप्ति है । जिस प्रकार एक ही कालेज से निकले छात्रों की आगे जाकर बहुत ही अलग अलग किस्म की गतियाँ होती हैं । ठीक वैसा ही यहाँ भी होता है । सिर्फ़ उनके स्थान विशेष हैं । जैसे व्यापार में रुचि रखने वाला मार्केट में ही जायेगा । चाहे उसने कैसी ही पढाई की हो । कुछ भी बना हो । नौकरी की रुचि वाला नौकरी करेगा । जहाँ आशा तहाँ वासा ..इसी को कहते हैं । सोच के अनुसार गति पहले से ही बनने लगती है ।
जैसे प्रसून जी नीलेश से अधिक निपुण हैं । तो क्या प्रसून जी की नीलेश से बेहतर गति होगी । उन दोनों के गुरु जी की पहुँच तो उन दोनों से अधिक है । तो क्या गुरु जी की गति उनसे भी बेहतर होगी ।
- गति के लिये वही कमाई वाला और क्या प्राप्ति हुयी ? सिद्धांत लागू होता है । विराट माडल में जो दिमाग के तीसरे दाँये टुकङे ( शब्द पर ध्यान दें ) वाला सिद्ध क्षेत्र है । वहाँ द्वैत के सिद्ध जाते हैं । परन्तु सिद्धियों का दुरुपयोग करने वाले निश्चय ही नरक में जाते हैं । फ़िर वे नीलेश प्रसून या उनके गुरु जी या अन्य कोई लाटसाहब ही क्यों न हों । योगियों की भी लगभग यही गति होती है । भक्त योगियों की और सिर्फ़ समर्पण भक्त इनसे ऊँची स्थिति को प्राप्त होते हैं । भक्ति को सबसे बङा स्थान प्राप्त है ।

क्या वाकई प्रसून जैसे लोग आजकल के गुप्त माडर्न ऋषि मुनि हैं ? आप ऋषि और मुनि के शाब्दिक अर्थ भी समझा दें । प्रसून जी और उनके गुरु जी आदि को किस उपाधि से पुकारा जाता है । महात्मा । योगी । ऋषि । मुनि । महर्षि । साधु । तान्त्रिक । सिद्ध । मान्त्रिक । यन्त्र माहिर आदि में से क्या उपाधि है ?
- ऋषि का अर्थ प्रायोगिक शोधकर्ता । खोज करने वाला । और मुनि का अर्थ - उपलब्ध ज्ञान या स्थितियों पर मनन चिंतन करने वाला । आपने जितनी उपाधि बतायीं हैं । इन्हें सभी ही कहा जाता है । लेकिन खास इनके लिये एक शब्द प्रयुक्त होता है - सिद्ध । यानी जिसने ज्ञान विशेष को प्रयोगात्मक स्तर पर सिद्ध कर लिया हो
गुप्त और खुले क्या । आधुनिक और प्राचीन क्या । ज्ञान अलग बात है । और व्यक्ति की लाइफ़ स्टायल अलग बात है कि वह किस तरह रहना पसन्द करता है । पुराने समय में भी अर्जुन कर्ण भीम और श्रीकृष्ण आदि वही तपस्या वही योग करते थे । जो उस समय जंगलों में कुटी में रहने वाले साधु महात्मा करते थे । इनको अपने तरह का जीवन पसन्द था । उनको बाबागीरी वाला । मौज अपनी अपनी । मियाँ बीबी राजी । फ़िर क्या करे काजी । आज भी बहुत से महात्मा पुराने समय की तरह जंगल गुफ़ाओं आदि में रहते हैं ।
अब पुराने साधु बाबा etc भोजपत्र ( भोज वृक्ष की क्षाल ) पर ज्ञान को लिखते थे । राजीव बाबा ब्लाग पर लिख रहे हैं । बताईये । आजकल भोजपत्र पर । या कलम दवात से कागज पर । या कपङे पर । या दीवालों पर ज्ञान लिखने की कोई तुक है ?

इन जैसे लोग अक्सर किस तरह के लोकों में जाते हैं ? और कितनी देर के लिये जाते हैं ? फ़िर समय पूरा होने पर इन्हें अच्छी जगह मानव जन्म मिल जाता है । या ये लोग अपनी इच्छा अनुसार भी किसी अच्छे संस्कारों वाले घर में जन्म ले सकते हैं । प्रसून और नीलेश जैसे लोग 84 लाख योनियों में तो नहीं जाते । क्या प्रसून जी और उनके गुरु जी की पहुँच दसवें द्वार तक होती है ?
- दसवें द्वार का मार्ग मध्य मार्ग है । जबकि सिद्ध ज्ञान का मार्ग दाँयी तरफ़ है । सफ़ल और परोपकारी सिद्ध 84 लाख योनियों में नहीं जाते । लेकिन ये अपनी इच्छानुसार मनुष्य जन्म नहीं ले सकते । ये सिर्फ़ सच्चे सतगुरु से हँसदीक्षा या 84 भोगने के बाद ही मिलता है । इसीलिये दुर्लभ है ।
जिनकी भी पहुँच दसवें द्वार तक हो जाती है । क्या वो लोग 84 लाख योनियों में तो नहीं भटकते । उन्हें बार बार मानव जन्म मिल जाता है ।
- दशम द्वार यानी 10वाँ द्वार तो बहुत बङी बात है । बहुत ऊँची स्थिति है । द्वैत या अद्वैत के सच्चे गुरु द्वारा दीक्षा के समय सिर्फ़ बृ्ह्माण्डी लाक ( आई ब्रो के बीच में ) के खुल जाने से ही मनुष्य फ़िर 84 लाख योनियों में नहीं जाता ।
क्या है ये 10वाँ द्वार - मनुष्य के सिर में जो ऊपर माथे से लेकर हिन्दू चोटी वाला घूमा हुआ भँवर सा स्थान है ।

इसके लगभग बीच में । या माथे से दो इंच सिर की तरफ़ एक सूराख हो । और उस सूराख में एक इंच नीचे ही - ये ध्वनि शब्द रूपी 10वाँ द्वार है । संसार में ये ध्वनि सिर्फ़ झींगुर की ध्वनि से मिलती है । ये ध्वनि जब गुरु कृपा से अंतर में प्रकट हो जाती है । तो इसको सुनने से जमा संस्कारों का नाश होने लगता है । नये भी नहीं बनते । इस द्वार में अन्दर प्रविष्ट तभी होती है । जब मनुष्य वासना रहित हो जाता है । ये द्वार बेहद सूक्ष्म सुई के नोक जैसा है । कबीर ने इसी को प्रेम गली कहा है - प्रेम गली अति सांकरी ।
इसको जानने वाले का बारबार मनुष्य जन्म ही होता है । जब तक वह मुक्त नहीं हो जाता ।
अगर ये अपनी स्व-इच्छा से इस धरती पर ही कहीं रहना चाहें । तो क्या अदृश्य रुप से भी कहीं भी रह सकते हैं । बेशक किसी जंगल या किसी अच्छे घर में ।
- रहते ही हैं । रह रहे हैं । हिमालय आदि क्षेत्र में अमेरिका आदि के जंगली क्षेत्र में आपके नये फ़्लैट जैसे स्थान पर ऐसे बहुत से लोग रहते हैं । वैसे बर्फ़ीले सुनसान क्षेत्र या ध्रुवों जैसे सुनसान क्षेत्र पर ऐसे लोग अधिक रहते हैं ।
हँस दीक्षा वाले अपनी भक्ति अनुसार ( बेशक अनेक जन्म लग जाये भक्ति में ही ) भगवान जैसे पद को भी प्राप्त हो जाते हैं ।
- हँस दीक्षा तो बहुत बङी और दुर्लभ दीक्षा है । भगवान बनना तो द्वैत भक्ति से ही सम्भव है । केवल इसीलिये तो मनुष्य जीवन मिलने को दुर्लभ कहा गया है । यदि इंसान चाहे । तो इसमें भगवान और उससे भी बहुत बङा बन सकता है । जिस प्रकार अब्राहम लिंकन जैसा गरीब बालक राष्ट्रपति बन जाता है । स्व धीरू भाई अम्बानी जैसा धनपति बन जाता है । प्रहलाद इन्द्र बन जाता है । ध्रुब ऐश्वर्य पूर्ण लोक को प्राप्त करता है । उसी प्रकार भक्ति द्वारा कल्पनातीत प्राप्ति होती है ।
भक्ति स्वतन्त्र सकल गुन खानी । बिनु सतसंग न पावहि प्रानी ।
अर्थात कर्मगति परतन्त्र ( दूसरे के वश में ) है । परन्तु भक्ति स्वतन्त्र है । और सभी गुणों की खान है । लेकिन बिना सतसंग के इसको नहीं पा सकते ।
आपने किसी लेख में कहा है कि - परमात्मा और ईश्वर में फ़र्क होता है ?  क्या फ़र्क होता है ।
- ईश्वर का अर्थ प्रथ्वी पर केन्द्रीय वित्त मंत्री के जैसा है । या विश्व बैंक के चीफ़ जैसा । जो इस ऐश्वर्य का मालिक हो । ये भी एक उपाधि है । कुबेर इस खजाने का जरूरत अनुसार वितरण करता है । परमात्मा वास्तव में आत्मा की अनादि स्थिति  से कहते हैं । वह इन सबसे ही परे है । सबका ही मालिक है । साहेब है । और सबसे बङी खास बात वह हर उपाधि से रहित है ।
उस पर कभी कोई भी कैसा भी नियम लागू नहीं होता । पर अखिल सृष्टि की सभी महाशक्तियाँ भी उसके अधीन उसके नियम पर कार्य करती हैं । प्रथ्वी पर शरीरधारी परमात्मा का रूप वास्तविक परमहँस हुआ " फ़क्कङ सन्त " होता है । इसकी मौज निराली होती है । इससे बङा कहीं भी कोई भी नहीं होता । इनके बाद सृष्टि की सबसे बङी शक्ति " होनी " और फ़िर दूसरी सबसे बङी शक्ति " प्रकृति देवी " भी इनके समक्ष खङे होने में थरथर कांपती है ।
एक बार को आपको विराट ( जैसा अर्जुन आदि को दिखाया था ) के दर्शन हो जायँ । सभी महाशक्तियों के एक साथ ही दर्शन हो जायँ । ये तो सम्भव हो भी सकता है । पर एक " फ़क्कङ सन्त " के दर्शन अति से अति दुर्लभ हैं । इनकी एक कृपादृष्टि ही जीव का तुरन्त उसी समय ही उद्धार कर देती है ।
भगवान और ईश्वर में क्या फ़र्क होता है ? क्या अखिल सृष्टि में भगवान और ईश्वर से भी बडी गुप्त । अलौकिक । रहस्यमयी । सूक्ष्म शक्तियाँ होती हैं ।
- भगवान और ईश्वर से भी बहुत बडी बङी शक्तियाँ होती है । ईश्वर के बारे में बता ही चुका । विष्णु । शंकर । राम । श्रीकृष्ण । वामन । नरसिंह आदि बहुत से कार्यों को भेजे गये । या ऐसे ही कार्यों के लिये नियुक्त की गयी आत्मा को भगवान कहा जाता है । ये भी आत्मा की एक उपाधि ही है ।
अन्त में ये भी बता दें कि पण्डित । पुजारी । विद्वान । पण्डा । पण्डी । ब्राह्मण । बृह्म इन जैसे शब्दों के शाब्दिक अर्थ क्या हैं ?
- पण्डित - सही अर्थ ज्ञानी । और एक जाति । पुजारी - पूजा करने वाला । मन्दिर में नियुक्त  । विद्वान - विषय विशेष का ज्ञाता । शास्त्र ज्ञानी । थ्योरी को जानने वाला  । पण्डा - गंगा तट तथा मन्दिरों आदि पर कर्मकाण्ड कराने वाले । पण्डी - पण्डा की घरवाली ( वैसे वाहर बाली भी हो सकती है । सब चलता है । आय लव माय इण्डिया ) । ब्राह्मण - बृह्म में स्थिति योगी । बृह्म को अनुभूत स्तर पर जीते जी जानने वाला  । वहाँ पहुँच रखने वाला । बृह्म - आत्मा की एक उपाधि । सृष्टि का कर्ता पुरुष । अहम बृह्मास्मि - योग में एक स्थिति पर पहुँच जाने पर होने वाला बोध ।
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चलते चलते - उस समय मेरे दोनों भांजे छोटे थे । करीब 4-5 साल के । दोनों मम्मी के बजाय पापा को अधिक प्यार करते थे । क्योंकि मम्मी पिटाई लगाती थी । वे अपनी मम्मी पापा के साथ जम्मू वैष्णों देवी देखने गये । और जब सीङियाँ चढकर ऊपर जा रहे थे । तब अन्य दर्शनार्थी - जय माता दी..कहते हुये ऊपर जा रहे थे । इन्होंने बालमन से सोचा - सभी बारबार माताजी की ही जय बोल रहे हैं । पिताजी की जय कोई नहीं बोलता । अतः जैसे ही अगली बार दर्शनार्थियों ने - जय माता दी..बोला । इन्होंने तुरन्त - जय पिताजी बोला । फ़िर उनके - जय माता दी..पर बराबर जय पिताजी..कहते हुये उन्होंने पूरी सीङियाँ चङी । तमाम लोग इन नन्हें बच्चों के साथ मुस्कराते हुये कब सीङियाँ चढ गये । पता ही नहीं लगा ।
जय सीता जी ।

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